Thursday, March 2, 2017

@PMOIndia plz reconsider new surcharge on atm withdrawal.hamare hi paise par kitne tax

Friday, August 12, 2016

जरासंध की कथा और मानव जीवन का चक्र -
कंस की दो रानिया थी -अस्ति और प्राप्ति जो मगध के राजा जरासंन्ध की पुत्रिया थी -भगवान् कृष्ण द्वारा कंस का वध होने के बाद दोनों अपने पिता जरासंध के पास चली गयी । बदला लेने को जरासंन्ध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया । श्री बलराम और श्री कृष्ण ने हर बार उसकी सारी सेना का वध कर उसे जीवित छोड़ दिया ।
१८वी बार उसने -भगवान् शंकर से अजेय होने का वर प्राप्त - म्लेच्छ राजा -कालयवन के साथ मथुरा पर आक्रमण किया । भगवान् कृष्ण ने विश्वकर्मा द्वारा द्वारिका पुरी बसवाकर -पहले ही सभी मथुरा वासिओ को द्वारका भेज दिया था । कालयवन के सामने से भागते हुए श्री कृष्ण एक पर्वत की गुफा में पन्हुचे और अपना उत्तरीय वहा सोते हुए राजा मुचकुंद पर डाल दिया ।पीछे से आते हुए कालयवन ने मुचकुंद को श्री कृष्ण समझ -जोर से ठोकर मारी और मुचकुंद की द्रष्टि पड़ते ही कालयवन भस्म हो गया । पहले समय में मुचकुंद ने इंद्र की सहायता दानवो को हराने में की थी और थके हुए मुचकुंद को इंद्र ने वर दिया था कि जो कोई उसे जबरन जगायेगा वह उसकी द्रष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा ।
फिर कालयवन की सेना का वध कर -जरासंध के सामने आने पर श्री कृष्ण और बलराम भागते हुए प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ गए । जरासंध ने पर्वत में आग लगा दी ।श्रीकृष्ण बलराम सहित वहा से आकाश मार्ग से द्वारका चले गए । जरासंध यह समझ कर कि दोनों जल गए -अपनी जीत का डंका बजाते हुए चला गया ।
यह कथा मानव जीवन के चक्र को भी बताती है ।मथुरा -हमारा शरीर है - ज़रा + संध - ज़रा माने बुढापा और संधि माने जोड़ । ओल्ड एज में शरीर के जोड़ो में दर्द पैदा हो जाता है -यही जरासंध का हमारे मथुरा पर हमला है । हम योग से -दवाओं से -जोडो में दर्द को ठीक कर बार बार जरासंध को परास्त करते है परन्तु अंतिम बार जब -जरासंध -काल यवन ( यमराज ) के साथ हमला करता है -तब तो मथुरा ( शरीर ) छोड़ कर भागना ही पड़ता है -बचने का एक ही रास्ता -प्रभु के उत्तीर्ण ( वस्त्र ) स्वरुप में अपने को लीन कर लो - तो काल यवन भी भस्म हो जाएगा ।
और फिर प्रवर्षण पर्वत को आग लगाना ( यह सभी की अंतिम शैया चिता ही तो है ) वहा से राम नाम का बल ( बलराम ) और प्रभु कृष्ण का साथ ही प्रभु के धाम द्वारका पंहुचा सकता है जो अत्यंत दुर्लभ है ।

Sunday, November 11, 2012

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जब भीमसेन ने दुर्योधन की जंघाओं पर वार किया और दुर्योधन की दशा खराब हो गई तो उसकी दशा देख उनकी आंखे क्रोध से लाल हो गई। वे कृष्ण से कहने लगे- कृष्ण दुर्योधन मेरे समान बलवान है इसकी समानता करने वाला कोई नहीं हे। आज अन्याय करके दुर्योधन को गिराया गया है।तब श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि जब दुर्योधन ने द्रोपदी के साथ र्दुव्यहार किया था तब भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी गदाओं से दुर्योधन की जंघाओं को तोड़ देंगे अब आगे....
दुर्योधन को भीमसेन के द्वारा मारा गया देख पांडव व पांचालों को बड़ी प्रशंसा हुई। वे सिंहनाद करने लगे। किसी ने धनुष टंकारा तो कोई शंख बजाने लगा। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने कहा मरे हुए शत्रु को अपनी कठोर बातों से फिर मारना उचित नहीं है। कृष्ण बोले यह मर तो उसी दिन गया था जब इसने लज्जा को त्यागकर पापियों के समान काम करना शुरू कर दिया था। श्रीकृष्ण की बात सुनकर सब नरेश अपने-अपने शंख बजाते हुए शिविर को चले गए। सब लोग पहले दुर्योधन की छावनी में गए वहां कुछ बूढ़े मंत्री और किन्नर बैठे थे बाकि रानियों के साथ राजधानी चले गए थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- तुम स्वयं उतरकर अपने अक्षय तरकस व धनुष को भी रथ से उतार लो। इसके बाद में उतारूंगा यही करने में तुम्हारी भलाई है। अर्जुन ने वैसा ही किया। फिर भगवान ने घोड़ों की बागडोर छोड़ दी और स्वयं भी रथ से उतर पड़े। जैसे ही कृष्ण रथ से उतरे ही उस रथ पर बैठा हुआ दिव्य कपि अंर्तध्यान हो गया।
उसके सारे उपकरण व धुरी लगाम, घोड़े जलकर नष्ट हो गए। यह देख सभी पांडवों को बहुत आश्चर्य हुआ। यह देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा हे प्रभु यह क्या आश्चर्य जनक घटना हो गई। एकाएक रथ क्यों जल गया? यदि मेरे सुनने योग्य हो तो इसका कारण बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन लड़ाई  में बहुत तरह के अस्त्रों के आघात से यह रथ तो पहले ही जल चुका था। सिर्फ बैठे रहने के कारण भस्म नहीं हुआ था। जब तुम्हारा सारा काम पूरा हो गया तब मैंने इस रथ को छोड़ा।

Friday, July 29, 2011

swami vivekanad speak


पाप-पुण्य के बारे में कई बातें कही जाती है। कुछ लोग जिसे पाप मानते हैं, दूसरे उसे ही उचित या सही ठहरा देते हैं। जो बात किसी के लिये उसका कर्तव्य और धर्म है वह किसी के लिये घोर पाप या नीच कृत्य हो सकता है।

सरल और थोड़े से शब्दों में यदि पाप की परिभाषा देना हो तो कहा जा सकता है कि- अपने स्वार्थ यानी मतलब के लिये किसी को धोखा देना, उसका हक हड़पना, गुमराह करना और उसके आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाना ही दुनिया का सबसे बड़ा पाप कर्म है।

आइये चलते हैं कि  एक बेहद सुन्दर कथा की ओर जो पाप के एक नए ही रूप से आपका परिचय कराती है....

स्वामी विवेकानंद अपने अमेरिका प्रवास से विदाई ले रहे थे। उनके भाषणों ने पूरे अमेरिका में धूम मचा रखी थी। सभागार सुनने वालों से खचाखच भरे होते थे। उनके व्याख्यानों में बम छूटते थे। लोगों के अंधविश्वासों और अवैज्ञानिक धारणाओं को स्वामी जी अपने अचूक तर्कों और वैज्ञानिक विश्लेषणों से तहस-नहस कर देते थे। आज इस बात की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईसाइयों के देश में यह अकेला हिन्दू संन्यासी कितने साहस और पौरुष के साथ भारतीय अध्यात्म की पताका फहरा रहा था।

ईसाई श्रोताओं के बीच हमारा यह योद्धा संन्यासी जोर से उद्घोष करता है-'' पश्चाताप मत करो( कन्फेशन), पश्चाताप मत करो.....यदि आवश्यक हो तो उसे थूक हो, परंतु आगे बढ़ो! बढ़ते चलो !! पश्चाताप के द्वारा अपने को बंधनों में मत डालो। अपने पवित्र, चिरमुक्त तथा परमात्मा के साकार रूप आत्मा को जानकर पाप के बोझ जैसा कुछ जो भी, उसे फेंक डालो। किसी को भी पापी कहने वाला खुद ईश्वर की निंदा करता है। तुम सभी सम्मोहित हो, इससे बाहर निकलो। याद रखो कि तुम सभी ईश्वर की दिव्य संतानें हो, अपनी महानता और दिव्यता को सदैव याद रखो। और उस दिव्यता के अनुरूप ही तुम्हारा जीवन होना चाहिये।''

स्वामी विवेकानंद के इन महान तेजस्वी विचारों का ही कमाल था कि उनके आध्यात्मिक विचार तेज गति से सारे संसार में फेल गए।

Friday, March 25, 2011

पूजा की बाद ब्राह्मण को दक्षिणा क्यों देना चाहिए?

पूजा की बाद ब्राह्मण को दक्षिणा क्यों देना चाहिए?

पूजन की महिमा को भारतीय सभ्यता में बड़े ही धार्मिक रूप में स्वीकार किया गया है। दान को मुक्ति और स्वर्ग की प्राप्ति का एक माध्यम माना गया है। पूजन के बाद दक्षिणा की देना हमारे धर्म में आवश्यक माना गया है।। दान के विषय में शास्त्र कहते हैं कि सद्पात्र को दिया गया दान ही फलदायी होता है। प्राचीन काल में ब्राह्मण को ही दान का सद्पात्र माना जाता था क्योंकि ब्राह्मण संपूर्ण समाज को शिक्षित करता था तथा धर्ममय आचरण करता था। ऐसी स्थिति में उनके जीवनव्यापन का भार समाज के ऊपर हुआ करता था।
सद्पात्र को दान के रूप में कुछ प्रदान कर समाज स्वयं को सम्मानित हुआ मानता था।घर में किसी भी तरह के पूजन के बाद यदि आपके समर्पण का आदर करते हुए किसी ने आपके द्वारा दिया गया दान स्वीकार कर लिया जाए तो आपको उसे धन्यवाद तो देना ही चाहिए। पूजन के बाद दी जाने वाली दक्षिणा, दान की स्वीकृति का धन्यवाद है। इसीलिए पूजन के बाद दी जाने वाली दक्षिणा का विशेष महत्व बताया गया है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है कि दान देने वाले व्यक्ति की इच्छाओं का दान लेने वाले व्यक्ति ने आदर किया है। इसीलिए वह धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापित करने का पात्र भी है।हम में से अधिकांश लोग सिर्फ अपने अवगुण या दूसरों के अवगुणों को देखने या गिनाने में लगें रहते हैं, इसलिए हमारा ध्यान किसी की अच्छाई पर जाता ही नहीं। क्योंकि हमें तो बुराई देखने की आदत हो चुकी है। हम हर जगह बुराई ढुंढने में इतने मशगुल हैं, कि किसी के बुरे पहलु में हम अच्छाई ढूंढने की सोच भी नहीं पाते जबकि यह बात हम सब जानते हैं कि हर बुराई के पीछे कोई ना कोई अच्छाई छुपी होती है।

पूजा की बाद ब्राह्मण को दक्षिणा क्यों देना चाहिए?

पूजा की बाद ब्राह्मण को दक्षिणा क्यों देना चाहिए?

पूजन की महिमा को भारतीय सभ्यता में बड़े ही धार्मिक रूप में स्वीकार किया गया है। दान को मुक्ति और स्वर्ग की प्राप्ति का एक माध्यम माना गया है। पूजन के बाद दक्षिणा की देना हमारे धर्म में आवश्यक माना गया है।। दान के विषय में शास्त्र कहते हैं कि सद्पात्र को दिया गया दान ही फलदायी होता है। प्राचीन काल में ब्राह्मण को ही दान का सद्पात्र माना जाता था क्योंकि ब्राह्मण संपूर्ण समाज को शिक्षित करता था तथा धर्ममय आचरण करता था। ऐसी स्थिति में उनके जीवनव्यापन का भार समाज के ऊपर हुआ करता था।
सद्पात्र को दान के रूप में कुछ प्रदान कर समाज स्वयं को सम्मानित हुआ मानता था।घर में किसी भी तरह के पूजन के बाद यदि आपके समर्पण का आदर करते हुए किसी ने आपके द्वारा दिया गया दान स्वीकार कर लिया जाए तो आपको उसे धन्यवाद तो देना ही चाहिए। पूजन के बाद दी जाने वाली दक्षिणा, दान की स्वीकृति का धन्यवाद है। इसीलिए पूजन के बाद दी जाने वाली दक्षिणा का विशेष महत्व बताया गया है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है कि दान देने वाले व्यक्ति की इच्छाओं का दान लेने वाले व्यक्ति ने आदर किया है। इसीलिए वह धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापित करने का पात्र भी है।हम में से अधिकांश लोग सिर्फ अपने अवगुण या दूसरों के अवगुणों को देखने या गिनाने में लगें रहते हैं, इसलिए हमारा ध्यान किसी की अच्छाई पर जाता ही नहीं। क्योंकि हमें तो बुराई देखने की आदत हो चुकी है। हम हर जगह बुराई ढुंढने में इतने मशगुल हैं, कि किसी के बुरे पहलु में हम अच्छाई ढूंढने की सोच भी नहीं पाते जबकि यह बात हम सब जानते हैं कि हर बुराई के पीछे कोई ना कोई अच्छाई छुपी होती है।

on situvation of our society & nation

aaj kal mane mahsoosh kia aur dekha ki har aadami apni baat kewal aur kewal kahna chahat hai /janat hai.doosre ki koi bat  sunne ko koim taiyarr nhi. ye batt sansad se sadak aur person se family aur gaoun se sehar tak lagu hoty hai ..................koi khta haimai imandar hoo, my minister not infom me , i m so busy so i can not read news paper , so i dont kno.thoms was chargsheeted............... mai jatt hoo maine desh ke liye ladae ldi hai . mere ghar me tractor ,maruti, motor cyle 7 10 BIGHE KI KHETI HAI  MUJHE AARCHAN CHAHIYE.........etc.
                                     koi unke bare me nhi sochta jinko khane ke liye jaati chupakar kamm karna padata hai.............................. kaun sunega .............